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Tuesday, October 5, 2010

'ई - कचरे' का बढ़ता खतरा

आपने कभी गौर किया है कि कबाड़े वाले को आप घर का जो कबाड़ बेचते रहे हैं उसमे अब पुराने अखबारों , बोतल - डिब्बों , लोहा - लक्कड़ के साथ एक खतरनाक चीज़ जुड़ गयी है --- - कचरा. पीसी पुराना हो जाए तो उसे अपग्रेड कराना हमें झंझट लगता है। इससे ज्यादा सुविधाजनक लगता है नया खरीदना, लेकिन तकनीक के साथ कदमताल के इस जुनून में एक पल ठहरकर क्या हम सोचते हैं कि पुराने पीसी का क्या होगा? पीसी ही क्यों, मोबाइल, सीडी, टीवी, रेफ्रिजरेटर, एसी जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक आइटम हमारी जिंदगी का इतना अहम हिस्सा बन गए हैं कि पुराने के बदले हम फौरन लेटेस्ट तकनीक वाला खरीदने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन पुरानी सीडी व दूसरे ई-वेस्ट को डस्टबिन में फेंकते वक्त हम कभी गौर नहीं करते कि कबाड़ी वाले तक पहुंचने के बाद यह कबाड़ हमारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि पहली नजर में ऐसा लगता भी नहीं है। बस, यही है ई-वेस्ट का साइलेंट खतरा। लोगों की बदलती जीवन शैली और बढ़ते शहरीकरण के चलते इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का ज्यादा प्रयोग होने लगा है मगर इससे पैदा होने वाले इलेक्ट्रोनिक कचरे के दुष्परिणाम से आम आदमी बेखबर है . - कचरे से निकलने वाले रासायनिक तत्त्व लीवर , किडनी को प्रभावित करने के अलावा कैंसर, लकवा जैसी बीमारियों का कारण बन रहे हैं . खास तौर से उन इलाकों में रोग बढ़ने के आसार ज्यादा हैं जहाँ अवैज्ञानिक तरीके से - कचरे की रीसाइक्लिंग की जा रही है

डॉ शशांक शर्मा

दयालबाग विश्वविद्यालय , आगरा

(लेखक नवयुग संस्था से जुड़े हैं )

shashank .enviro@gmail.com

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